क्या अब भी इजराइल भारत का साथ देगा?

January 6th, 2009



आलोक तोमर
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 6 जनवरी-
भारत सरकार अब बहुत बड़े धर्म संकट मे हैं। फिलिस्तीन की गाजा पट्टी पर इजराइल के खूनी हमले में हजारों लोग मारे गए थे और भारत ने इन हमलों की निंदा की है।

दूसरी ओर इजराइल भारतीय सुरक्षा और गुप्तचर एजेंसियों के सबसे बड़े मददगारों में से है। उसकी गुप्तचर एजेंसी मोसाद ने तो भारत की एनएसजी और रॉ तक को प्रशिक्षित किया है। इसके अलावा हाल ही में इजराइल के नेताओं ने भारत के सामने प्रस्ताव रखा था कि अगर भारत पाकिस्तान के आतंकवादी शिविरों पर सीमित हमले बोलना चाहता है तो इजराइल उसकी हर तरह से मदद करेगा।

मगर गाजा पट्टी पर इजराइल का हमला भारत की एक सबसे बड़ी राजनयिक दिक्कत बन गया है। भारत फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र देश मानता है और उसके नेता यासिर अराफात को हमेशा भारत में राजकीय अतिथि का दर्जा दिया जाता रहा है। इजराइल से भारत के रिश्ते बहुत अच्छे हैं और मुंबई के हमलों में कई इजराइली नागरिक मारे गए थे और इसके बाद खुद इजराइल ने भारत से इन हमलों का बदला लेने में अपनी मदद का प्रस्ताव किया था।

भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने आज कहा कि उन्हें उम्मीद है कि इजराइल भारत की भावनाओं को समझेंगा और मानवाधिकार के रिकॉर्ड में गड़बड़ी नहीं आने देगा। उधर पाकिस्तान ने इजराइल की इस हमलावर शैली का कोई विरोध नहीं किया बल्कि आसिफ अली जरदारी ने इजराइल सरकार से दक्षिण पूर्व एशिया में तनाव घटाने में मदद भी मांगी है।

इजराइल को ले कर भारत के सामने एक और धर्म संकट यह है कि फिलिस्तीन के मामले में इजराइल को अमेरिका का पूरा समर्थन प्राप्त है। इतना ही नहीं अमेरिका इजराइल को आर्थिक तथा सामरिक मदद भी देता रहा है। पाकिस्तान पर कोई निर्णायक हमला इसलिए नहीं किया जा रहा क्याेंकि लोकसभा चुनाव सिर पर है और भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान रहते हैं और वे आम तौर पर कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टी समाजवादी पार्टी का परंपरागत वोट बैंक माने जाते हैं। अगर पाकिस्तान इजराइल की मदद पाने में सफल रहा तो भारत के सामने कई दिक्कते खड़ी हो जाएगी। छापामार लड़ाई में इजराइली सेना दुनिया की सबसे बड़ी विशेषज्ञ मानी जाती है।

पाकिस्तानी सवाल-कसाब को हिंदी आती है?

January 6th, 2009



आलोक तोमर
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 6 जनवरी-
पाकिस्तान ने मुंबई हमलों के बारे में लगातार दिए जा रहे सबूतों को नहीं मानने का सिलसिला जारी रखते हुए भारत से इस बात का प्रमाण मांगा हैं कि आतंकवादी आमिर अजमल कसाब का जो पत्र पाकिस्तानी उच्चायोग के जरिए सौपा गया है वह असली है।

पाकिस्तान भारत के खिलाफ नए नए मोर्चे खोलता जा रहा है। इंग्लैंड में पाकिस्तान के उच्चायुक्त वाजिद शमसुल हसन ने लंदन में कसाब के पत्र के बारे में अचानक टिप्पणी की। उन्होंने भारत को चुनौती देने के अंदाज में कहा कि पाकिस्तान और भारत के वकील बैठ जाए और खुद तय करें कि यह पत्र कितना असली हैं। हसन ने कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार यह पत्र हिंदी में हैं और अजमल कसाब को हिंदी लिखना नहीं आता।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस अनोखे बयान पर सिर्फ इतना कहा कि कसाब का मूल पत्र उर्दू में हैं और कानूनी जरूरतों के हिसाब से इसका हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद करवाया गया है। मूल पत्र और इसके अनुवाद पाकिस्तानी अधिकारियों को सौप दिए गए हैं और अब वे बहाना बना कर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। कसाब का पत्र दुनिया के सभी विदेश मंत्रियों को भेजा गया है और इनमें से बहुत सारे ऐसे हैं जो उर्दू पढ़ ही नहीं सकते। इसके अलावा अदालती कार्रवाई में उपयोग के लिए इसका हिंदी अनुवाद भी करवाया गया है।

उधर मुंबई पुलिस के अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि अब तक अजमल कसाब को यह नहीं बताया गया कि उसके मुल्क ने उसे अपना नागरिक मानने से ही इंकार कर दिया है। अधिकारियाें के अनुसार कसाब तनाव में हैं और बार बार खुद को मौत की सजा देने की बात कर रहा है। ऐसे में उसे और ज्यादा तनाव में डालने से डॉक्टरों ने ही मना किया है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार पाकिस्तान ने अमेरिका के जांच निष्कर्ष भी मानने से इंकार कर दिया है। भारत ने उन सभी 14 देशों से मुंबई हमले में पाकिस्तानी हाथ होने का सबूत देते हुए कहा है कि वे पाकिस्तान पर दबाव बनाए जिनके नागरिक इस आतंकवादी हमले में मारे गए थे। ऐसे देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इजराइल भी शामिल है। सबूत इतने सारे हैं कि पाकिस्तान चाहे जितने झूठ बोल ले उसकी बात पर अब कोई यकीन नहीं करेगा। उधर गुप्तचर जानकारियों के आधार पर मुंबई पुलिस से कह दिया गया है कि वे कसाब को लगातार सबसे सुरक्षित पहरे में रखे और उसके खिलाफ अदालती कार्रवाई भी सुरक्षित जगह पर ही की जाए।

कम उम्र का इतिहास उमर का नहीं, प्रफुल्ल का

January 6th, 2009

सुप्रिया रॉय
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 6 जनवरी-
जो लोग 38 वर्षीय उमर अब्दुल्ला को देश का सबसे कम उम्र का मुख्यमंत्री घोषित कर रहे हैं, वे शायद प्रफुल्ल महंत का नाम भूल जाते हैं। श्री महंत 1985 में 33 साल की उम्र में असम के मुख्यमंत्री बने थे।

इसके अलावा कम उम्र के मुख्यमंत्रियों की एक लंबी कतार हैं। हाल तक झारखंड के मुख्यमंत्री रहे मधु कोडा भी 36 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने थे मगर वे एक राजनैतिक संधि का नतीजा थे और बहुत कम समय अपने पद पर रह पाए।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर उमा भारती और अब शिवराज सिंह चौहान बैठे हैं और दोनों का जन्म कुछ महीने के अंतर से 1959 में हुआ था। उमा भारती जब मुख्यमंत्री बनी थी तब वे सिर्फ 42 साल की थी। वे भी बहुत लंबे समय तक मुख्यमंत्री नहीं रह पाई थीं। गोवा में चर्चिल अलेमाओ भी जब सिर्फ 4 विधायक ले कर मुख्यमंत्री बने थे तो सिर्फ 35 साल के थे। चर्चिल अलेमाओ भारत के इतिहास में अकेले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्हें तस्करी के आरोप में मुख्यमंत्री रहते हुए उनकी ही पुलिस ने गिरफ्तार किया था। यह बात अलग है कि उन्हें गिरफ्तार करने वाले गोवा के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक वाई आर धुरिया बाद में खुद रिश्वत लेते पकड़े गए और अपनी मृत्यु तक इस संबंध में मुकदमा लड़ते रहे।

उमर अब्दुल्ला का एक सबसे बड़ा इतिहास यह है कि उनके दादा शेख अब्दुल्ला और पिता फारूख अब्दुल्ला भी कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। अखिल भारतीय स्तर पर यह इतिहास नेहरू परिवार ने ही निभाया है जहां जवाहर लाल नेहरू, उनकी बेटी इंदिरा गांधी और उनके बेटे राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। अगर श्रीमती सोनिया गांधी पिछली बार अपना ताज उतार कर मनमोहन सिंह को नहीं पहना देती तो वे एक और इतिहास बना देती। वैसे उमर अब्दुल्ला के मुख्यमंत्री बनने पर उनके पिता फारूख अब्दुल्ला ने अपनी नाराजी की सारी बाते टाल कर कहा कि उन्हें अपने बेटे पर गर्व है। फारूख ने तो माइक से फिल्मी गाना गाया-पापा कहते है बड़ा नाम करेगा, बेटा हमारा ऐसा काम करेगा।

अयोध्या और धारा 370 शामिल होंगी घोषणा पत्र में?

January 6th, 2009


मिलन गुप्ता
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 6 जनवरी-
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने भाजपा को चेतावनी दे दी है कि लोकसभा चुनाव में अगर धारा 370 हटाने और राम मंदिर के निर्माण का प्रस्ताव पार्टी के घोषणा पत्र में नहीं हुआ तो संघ के स्वयं सेवक पार्टी की कोई मदद नहीं करेंगे।

संघ के नेताओं ने लाल कृष्ण आडवाणी के घर हुई बैठक में यह संकेत भी दे दिया कि चूंकि भाजपा से अलग हुई भारतीय जनशक्ति पार्टी की नेता उमा भारती इन दोनों मुद्दों पर टिकी हुई हैं इसलिए संघ परिवार उनका साथ देने का फैसला भी कर सकता हैं। यहां यह याद किया जा सकता है कि उमा भारती ने भाजपा से अलग होने के बावजूद संघ परिवार की कभी आलोचना नहीं की।

संघ के नेताओं और भाजपा के सभी महासचिवों और पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के साथ पिछले सप्ताह दिल्ली में हुई बैठक के रहस्य अब खुलते जा रहे है। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने बैठक के बाद कहा था कि सिर्फ संगठन संबंधी मुद्दों और राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय हालातों पर बात हुई लेकिन पार्टी में राजनाथ सिंह के दुश्मन कम नहीं हैं जो पार्टी अध्यक्ष के इस बयान को झूठा करार दे रहे हैं और इनका कहना यह है कि संघ परिवार ने राजनाथ सिंह को समझा दिया है कि वे सिर्फ पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी संभाले रहे लेकिन पार्टी के नेतृत्व का काम लाल कृष्ण आडवाणी को ही सौप दें।

भाजपा के प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने इन बयानों को काल्पनिक बताया है लेकिन उन्होंने भी यह कहने से इंकार कर दिया कि आखिर आडवाणी के घर बातचीत में असली मुद्दा था क्या? श्री जावड़ेकर ने कहा कि अफवाहे फैलाना उन लोगों का काम है जो नहीं चाहते कि भाजपा और ताकतवर बने क्योंकि उन्हें अब भाजपा से डर लगने लगा है। उधर एक टीवी चैनल को राजनाथ सिंह ने एक इंटरव्यू दे कर अपनी मुसीबत और बढ़ा ली है। उनसे पूछा गया था कि भाजपा का असली नेता वे हैं या आडवाणी। उन्होंने जवाब दिया कि पार्टी के असली नेता आज भी अटल बिहारी वाजपेयी हैं।

बाराक ओबामा को एक कश्मीरी चेतावनी

January 6th, 2009


पृथ्वीपाल
डेटलाइन इंडिया
नई दिल्ली, 6 जनवरी-
इसी महीने अमेरिका में सत्ता संभालने जा रहे राष्ट्रपति बराक ओबामा को उनके सभी सलाहकारों और विदा हो रहे राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने सलाह दी है कि वे कश्मीर के मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश भी नहीं करे।

ओबामा से कहा गया है कि पहले भी जब अमेरिका ने कश्मीर के मामले में पंच बनने की कोशिश की है तो भारत और पाकिस्तान दोनों ने खुल कर विरोध किया है। भारत तो अमेरिका को सीधे शब्दों में समझा चुका है कि कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच का मुद्दा है और इसे किसी तीसरे देश की मदद से नहीं सुलझाया जाएगा।

व्हाइट हाउस में जाने के पहले बराक ओबामा ने कश्मीर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से फोन पर बात की। जरदारी ने इतना कहा कि कश्मीर पाकिस्तान को दिलवाने के लिए अमेरिका राजनयिक दबाव बनाए और संयुक्त राष्ट्र की मदद दिलवाए, इससे ज्यादा उनकी कोई अपेक्षा नहीं हैं। ओबामा के सलाहकारों ने, जिनमें उनकी भावी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी हैं, कहा है कि अगर अमेरिका कश्मीर घाटी पर भारतीय नियंत्रण पर सवाल उठाता है तो इस्लामाबाद और श्रीनगर दोनों में तथाकथित जेहादी तत्वों को सहारा मिलेगा। इससे भारत और अमेरिका के रिश्ते भी खराब हो सकते हैं।

बराक ओबाम से कहा गया है कि वे फिलहाल श्री जरदारी पर यही दबाव बना कर रखे कि भारत के साथ शांति के सभी रास्ते खुले रखे जाएं और युद्व को हर कीमत पर टाला जाए। लेकिन ओबामा से यह भी कहा गया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिका के शामिल होने वाले विकल्प को टाला ही जाना चाहिए।

अमेरिका भारत या पाकिस्तान में एक नया राजनयिक कार्यालय खोलना चाहता है और इस कार्यालय का एक उद्देश्य अफगानिस्तान सीमा पर अमेरिका को पाकिस्तानी मदद जारी रखने के लिए मजबूर करना भी है। लेकिन पाकिस्तानी रक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि आसिफ अली जरदारी और युसूफ रजा गिलानी दोनों ही कमजोर शासक सिध्द हुए हैं और इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान में हालात जरा भी बिगड़े तो वहां सैनिक शासन दोबारा स्थापित होने से कोई नहीं रोक सकता।